Drought. Telangana. Efforts. जहां हुई गर्मी और पानी की कमी से सबसे ज्यादा मौतें, वहां लोगों ने ठान लिया है, अबके बरसेंगे तो बचा लेंगे एक-एक बूंद

किसानों ने ही नहीं, पुलिसवालों और आईटी इंजीनियरों ने भी पानी को बचाने के लिए शुरु की तैयारियां

ये तेलंगाना का मलकापुर गांव है। मुहाने पर ही बच्चियों का एक झुंड कुछ गाते हुए जा रहा है। उनके हाथ में कपड़े की एक छोटी सी गठरी है। उस कपड़े से कुछ बाहर फुदकता सा दिख रहा है। पूछने पर पता चला वो कपड़े में मेंढक बांधे लिए जा रही हैं। इसे गांव के देवता के पास छोड़ दिया जाएगा। यहां अच्छी बारिश के लिए यही पूजा की जाती है। इन्हें पूरी उम्मीद है जल्दी ही बारिश होगी और उनके गर्मी और सूखे से निजात मिलेगी।

गांव में 1800 लोगों के बीच 400 बोरवेल हैं। खेती हो या घर की जरूरतें। पानी इन्हीं बोरवेल से मिलता है। अभी केवल 12 में पानी बचा है। बाकी सभी सूख गए हैं। ग्राम पंचायत दफ्तर के आंगन में लगे पेड़ की छांव लिए बैठे हनुमंतराव और नरसिम्हा की उम्र 95 के करीब है। कहते हैं ऐसा सूखा 1975 में देखा था। उनके गांव के 80 प्रतिशत लोग खेती पर निर्भर हैं। और बिना पानी सब बंजर है। गांव में जो मवेशी थे उनमें से 70 प्रतिशत दोगुना नुकसान झेलकर बेच दिए गए हैं।

दोपहर 2 बजे का समय होगा। गांव की सड़कें सूनी पड़ी है। इक्का दुक्का गाड़ी नजर आती है। बच्चे बूढ़े सभी दड़बों की तरह घरों में बंद है। बाहर निकले तो मौत का खतरा है। दो हफ्ते पहले पास ही के जिले आदिलाबाद में दो बच्चों की लू लगने से मौत हो गई थी। वो मां के साथ किसी दूसरे गांव से लौट रहे थे। अब माएं काम पर जाती हैं तब भी बच्चों को घरों में बंद कर देती हैं। देश में तेलंगाना वह राज्य है जहां गर्मी और पानी की कमी से सबसे ज्यादा मौतें हुई हैं। 9 मई तक के आंकड़े देखें तो 260 लोगों की सांसे इस साल लू और झुलसती गर्मी सहन नहीं कर पाईं। स्टेट डिजास्टर मैनेजमेंट की स्पेशल कमिश्नर सदा भार्गवी के मुताबिक पिछले साल यहां 585 लोगों की मौत हुई थी। राज्य में 450 मंडल हैं जिनमें से 231 सूखा प्रभावित घोषित कर दिए गए हैं।

देश का सबसे नया राज्य है ये। 8 जून को दो साल का हो जाएगा। लेकिन पिछले दो सालों से यहां बारिश नहीं हुई। हुई है तो बस बूंदा बांदी।

इस साल मौसम विभाग ने अच्छी बारिश की उम्मीद जताई है। यही वजह है कि तेलंगाना के लोग पानी की हर बूंद बटोर लेना चाहते हैं। इसमें पुलिस वाले भी पीछे नहीं हैं। पुलिस विभाग ने हर थाने पर वॉटर रीचार्ज सिस्टम लगाया है। देश में शायद इकलौता पुलिस महकमा जो पानी बचाने के लिए आगे आया है। एडिशनल सीपी अंजनी कुमार बताते हैं हैदराबाद में पुलिस फोर्स के चार बड़े रेसिडेंशियल एरिया में भी वॉटर रिचार्ज सिस्टम फिट कर दिया गया है।

कुछ ऐसी ही पहल हाईटेक सिटी में सॉफ्टवेयर इंडस्ट्री एसोसिएशन के सदस्यों ने की है। रमेश लोगनाथन बताते हैं इसका आइडिया उन्हें टेडएक्स इवेंट के दौरान आया। बस फिर क्या था, किसी बोर्ड मीटिंग की तरह वो जुट गए वॉटर कंजर्वेशन पर रिसर्च करने। बकायदा डीआरडीओ, एनजीआरआई और बाकी वॉटर एक्सपर्ट के साथ मिलकर एक आसान डिजाइन तैयार किया। ये 10 से 15 हजार के खर्च में पूरी बिल्डिंग के लिए रीचार्ज का काम करता है। और इंस्टॉल करने में आधे दिन से भी कम का समय लगता है। इन्होंने अगले दो महीनों में 10 हजार ऐसे सिस्टम इंस्टॉल करने का टारगेट रखा है।

टारगेट तेलंगाना सरकार का भी है। मिशन काकतिया के तहत 46 हजार पानी की टंकियों को फिर से शुरु करना। ये वो टंकियां हैं जो राजा महाराजों के समय बनाई गई थीं। जबकि सरकारों के रात में तेलंगाना पानी के लिए बोरवेल पर निर्भर रहा। फिर चाहे पीने का पानी हो या सिंचाई। यही वजह है कि यहां धडल्ले से बोरिंग खोदे जाते हैं। नलगौंडा के रंगा रेड्‌डी अब बोरलू रंगा रेड्‌डी कहलाते हैं। कारण ये कि वो अपने यहां 72 बोरवेल खुदवा चुके हैं। एक बोरवेल सूख जाता तो वो दूसरा खुदवाते। एक पर कम से कम 40 हजार का खर्च आता है। ये तो थी अमीर किसान बोरलू रंगा रेड्‌डी की। किसानों के हितों के लिए काम कर रहे पिलुपु के रामबाबू कहते हैं तेलंगाना में गरीब से गरीब किसान के पास भी खेती की जमीन के साथ दो बोरवेल जरूर होते हैं। ज्यादातर बोरवेल सूख गए हैं इसलिए गर्मियों में भी गांव में बिजली बहुत मिल रही है। रामबाबू कहते हैं बोरवेल चलाने के लिए बिजली बहुत लगती है। अब पानी नहीं है तो बिजली वहां बच जाती है। नरसिम्हन ने इन परिस्थितियों में भी अपने लिए एक रास्ता निकाल लिया है। उनके 12 बोरवेल थे। अब चार में ही पानी बाकी है। पहले वो चावल उगाते थे। पानी कम हुआ तो सब्जियां उगाने लगे। कहते हैं इनमें हफ्ते में एक बार पानी देना होता है। उस पर उन्होंने और उनके चार भाईयों ने ड्रिप इरिगेशन से सिंचाई शुरु कर दी है। ताकि पानी का बूंद भी बर्बाद न हो। यही वजह है कि जब आसपास के कई खेत सूखे पड़े रहते हैैं तो उनके खेत पर सब्जियों की क्विंटलों फसल होती है।

यहीं कुछ लोग ऐसे भी हैं जो खेती तो करते हैं लेकिन किसान नहीं कहलाते। वजह बस इतनी है कि उनके नाम कोई जमीन नहीं है। या तो जमीन उनके दादा या पिता के नाम है। या फिर वो गरीब परिवार से हैं जहां लीज पर जमीन लेकर गुजारा होता है। मुश्किल तब आ खड़ी होती है जब ऐसा ही कोई बेनाम किसान सूखे और कर्ज से परेशान हो खुदखुशी कर लेता है। और उसके परिवार को मुआवजा नहीं मिलता। बल्कि इस मौत को पति पत्नी का आपसी झगड़ा ठहरा दिया जाता है। कोंडल रेड्‌डी पिछले चार सालों से आत्महत्या करनेवाले किसानों के परिवार को मुआवजा दिलवाने का काम करते हैं। डिस्ट्रिक्ट क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के मुताबिक पिछले दो सालों में तेलंगाना में 2332 किसान आत्महत्या कर चुके हैं। चौंकानेवाली बात ये है कि इनमें से 80 प्रतिशत ने आत्महत्या बोरवेल सूखने की वजह से की। सरकार ने इनमें से अब तक सिर्फ 382 को किसान मानकर मुआवजा दिया है।

जिन्हें मुआवजा नहीं मिला उनके लिए नजीमाबाद से सांसद और राज्य के मुख्यमंत्री की बेटी के. कविता एक अलग सिस्टम खड़ा किया हैं। उनका एक एनजीओ है जागृति। जिसके जरिए वो आत्महत्या करनेवाले बेनाम किसानों के परिवारों के हर महीने 2500 रू पहुंचाती हैं। ये पैसे ले रहे अभी 378 परिवार हैं। कविता कहती हैं ये परिवार तब तक उनकी जिम्मेदारी रहेंगे जबतक मृतक किसान के बेटे को नौकरी नहीं मिल जाती। इसके लिए बकायदा स्किल डेवलपमेंट प्रोग्राम भी चल रहा है। इस साल 3340 बच्चों ने ट्रेनिंग ली है। जागृति के राजीव सागर के मुताबिक अगले साल का टारगेट 40 हजार बच्चों को ये ट्रेनिंग देने का है। कविता के मुताबिक नौकरी सूखे से बंजर हुए तेलंगाना के लिए बड़ी चुनौती है। यही वजह है कि मेहबूब नगर जैसे जिले से 20 एकड़ जमीन के मालिक किसान हैदराबाद आकर चौकीदार की नौकरी करते हैं।

तेलंगाना ने पानी की जुगत और सूखे से निपटने के लिए केंद्र से 3064 करोड़ रु. मांगे थे। केंद्र ने 792 करोड़ दिए हैं। कविता इस पर अपना कैल्कूलेशन समझाती हैं। कहती हैं मौसम विभाग पहले ही चेतावनी दे देता है कि बारिश कम होगी जिससे सूखे का खतरा है। लेकिन हमारी सरकार जरूरत पड़ने पर कुंआ खोदती है। पहले जांच करने दल भेजा जाता है। और जब तक दल रिपोर्ट दे और पैसा केंद्र से उन्हें मिले तब तक बारिश शुरु हो जाती है। कविता के मुताबिक उनका नया राज्य है। वहां बजट में इतने पैसे होते हैं कि वो इमरजेंसी में इस्तेमाल कर सकें, लेकिन बुंदेलखंड और लातूर क्या करते होंगे जिनका बजट ही नेगेटिव में होता है। इसी बजट से तेलंगाना ने अगले तीन सालों में नल लगाकर पानी का सप्लाय शुरु करने का टारगेट रखा है। तब तक बोरवेल को ग्राम पंचायत और राज्य सरकार ने लीज पर लेकर पीने के पानी का जुगाड़ किया है।

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